Saturday, 17 September 2011

हिन्दी की बढ़ रही महत्ता




हिन्दी की बढ़ती महत्ता



देश में नयी पीढ़ी पर भले ही अंग्रेजी का भूत चढ़ रहा हो लेकिन विदेशों में हिन्दी की महत्ता पिछले सालों में काफी बढ़ी है.

भारत में अंग्रेजी की बढ़ती लोकप्रियता के बावजूद आंकड़ों के हिसाब से हिन्दी बोलने वालों की संख्या दुनिया में आज तीसरे नंबर पर है. विदेशी विश्वविद्यालयों ने हिन्दी को एक महत्वपूर्ण विषय के रूप में अपनाया है. 


हिन्दी को 1949 में 14 सितंबर के दिन भारत की संविधान सभा ने राजभाषा के रूप में स्वीकार किया था. तब से यह दिन हिन्दी दिवस के रूप में मनाया जाता है.

संविधान के अनुच्छेद 343 (1) में यह प्रावधान किया गया कि देवनागरी लिपि के साथ हिन्दी भारत की राजभाषा होगी.

पेनसिल्वानिया यूनिवर्सिटी में हिन्दी भाषा विज्ञान पढ़ाते रहे सुरेंद्र गंभीर का मानना है कि हर वर्ष लगभग 150 अमेरिकी भारत आकर शोध करते हैं और वे यह पाकर हताश होते हैं कि भारत में हिन्दी प्रयोग के अवसर बहुत ज्यादा नहीं हैं.

दूसरी ओर भारत को बेहतर ढंग से जानने के लिए दुनिया के करीब 115 शिक्षण संस्थानों में हिन्दी का अध्ययन होता है. अमेरिका में 32 विश्वविद्यालयों और शिक्षण संस्थानों में हिन्दी की पढ़ाई होती है.ब्रिटेन के लंदन विश्वविद्यालय, कैंब्रिज और यॉर्क विश्वविद्यालय में भी हिन्दी का अध्ययन होता है. 

जर्मनी के 15 शिक्षण संस्थानों ने हिन्दी भाषा तथा साहित्य के अध्ययन को अपनाया है. यहां कई संगठन हिन्दी के प्रचार का काम करते हैं. हॉलैण्ड में 1930 से हिन्दी का अध्ययन हो रहा है. यहां के चार विश्वविद्यालयों ने इसे प्रमुख विषय के रूप में अपना रखा है.

चीन की बात करें तो यहां 1942 में हिन्दी को अध्ययन का एक प्रमुख विषय मानने की शुरुआत हुई. चीन में पहली बार हिन्दी रचनाओं का अनुवाद कार्य 1957 में शुरू हुआ और इसी कड़ी को आगे बढ़ाते हुए बीजिंग विश्वविद्यालय के प्रोफेसर विड हान ने तुलसीदास कृत रामचरित मानस का चीनी भाषा में अनुवाद किया.

इटली के लोग भी भारत की संस्कृति से रूबरू होने के लिए हिन्दी सीखने की इच्छा रखते हैं.

रूस में बड़े स्तर पर हिन्दी रचनाओं और गंथों का रूसी भाषा में अनुवाद कार्य होता है. यहां के लोगों में हिन्दी सीखने की अत्यधिक ललक है. रूसी लोग हिन्दी फिल्मों और हिन्दी गीतों के दीवाने हैं.

नृत्य क्षेत्र में कॅरियर बनाने के लिए भारत को चुनने वाली रूसी नर्तकी विक्टोरिया का कहना है कि उन्हें भारत से ही नहीं बल्कि हिन्दी भाषा से भी लगाव है. वह हिन्दी फिल्में देखना पसंद करती हैं. ऐसा ही कहना है कजाकिस्तान की नर्तकी अलबीना का.

फ्रांस के पेरिस विश्वविद्यालय की बात करें तो वहां हर साल 60-70 विद्यार्थी हिन्दी अध्ययन के लिए प्रवेश लेते हैं.

ऑस्ट्रेलिया के कैनबरा और मेलबर्न विश्वविद्यालय में भी हिन्दी पढ़ाई जाती है. विएना विश्वविद्यालय और बेल्जियम के तीन विश्वविद्यालयों में भी हिन्दी का महत्वपूर्ण स्थान है. जापान में भी हिन्दी का अहम स्थान है. जापान रेडियो से पहला हिन्दी कार्यक्रम 1950 में प्रसारित हुआ था. फिजी में व्यापार,बाजार,कारखानों जैसे सभी क्षेत्रों में हिन्दी का दबदबा है.

मारीशस में भी हिन्दी काफी लोकप्रिय है और यहां के 260 प्राथमिक स्कूलों में नियमित तौर पर हिन्दी की पढ़ाई होती है. इस तरह देश में उपेक्षित होने के बावजूद दुनिया में हिन्दी अपना रुतबा कायम करने में सफल रही है.

यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्सास में चार दशक से अधिक समय से हिन्दी का अध्यापन कर रहे डॉ. हर्मन वन ओल्फेन जब दिल्ली आए तो यह देखकर हैरान रह गए कि विदेशों में हैसियत हासिल कर रही हिन्दी खुद भारत में उपेक्षित है. 

हर्मन का मानना है कि स्वतंत्रता के बाद भारत में हिन्दी को जो स्थान मिलना चाहिए था,वह नहीं मिला.


सौजन्य : `समय'



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